Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Beli : 1 : 25
पवित्र बीजक : प्रग्या बोध : बेलि : 1 : 25
बेलि : 1 : 25
शिर धुनि हंसा उड़ि चले , हो रमैया राम !
शब्द अर्थ :
शिर = मानव शरीर अंग सर ! धुनि = अग्नी ! हंसा = प्रग्या बोध , चेतन राम , चेतना , आत्मा ! उड़ि चले = छोड दिया ! हो रमैया राम = हे राममय साधु संतो !
प्रग्या बोध :
परमात्मा कबीर बेलि के इस पद में कहते है भाईयों ये शरीर चेतन तत्व राम से बना है , शृष्टी के हर कण कण में चेतन तत्व राम ही है ,सब में राम और हम सब राम में है पर तत्व से मिलना यानी जुडना और तत्व से अलग होना यानी टूटना यह प्रक्रिया निरंतर शुरू है इस जूडने के प्रक्रिया और टूटने की प्रक्रिया नये को जन्म देती है जुने का क्षय करती है इस लिये मानव जीवन एक बुलबुले के जैसा ही क्षण भंगुर है इस क्षण भंगुर जीवन मे अनमोल मानव शारीर बहुत दूर्लभ है जो इसी मानव जीवन मे चेतन राम स्वरूप के दर्शन की संभावना धर्म आचरण यानी शिल सदाचार के आचरण से बनती है ! जैसे ही मृत्यू आती है शरीर आग या मिट्टी के हवाले होता है पंच तत्व में विलिन होता है उसके बाद यह शरीर कुछ नही कर सकता इस लिये जो कुछ अच्छा करना है ज़िते जी कर लो !
धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस
दौलतराम
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती
मुलभारतिय हिन्दूधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान
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